लद्दाख की पुगा वैली में भारत के पहले जियोथर्मल पावर प्रोजेक्ट को लेकर बड़ी प्रगति हुई है। यह प्रोजेक्ट ONGC Energy Centre द्वारा लद्दाख प्रशासन और LAHDC Leh के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य धरती के अंदर मौजूद प्राकृतिक गर्मी का इस्तेमाल करके बिजली पैदा करना है।
पुगा वैली समुद्र तल से 14 हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित है और हिमालय के जियोथर्मल बेल्ट का हिस्सा है। यहां धरती के अंदर मौजूद गर्म चट्टानों और गर्म पानी के कारण बड़ी मात्रा में geothermal energy उपलब्ध है।
प्रोजेक्ट के तहत दो जियोथर्मल कुएं करीब 1,000 मीटर गहराई तक तैयार किए गए हैं। इनमें से एक कुआं गर्म पानी और भाप निकालने के लिए और दूसरा geothermal fluid को वापस जमीन के अंदर भेजने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
पुगा में पहले किए गए परीक्षणों में करीब 400 मीटर की गहराई पर 200 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान वाली गर्मी मिली थी। बाद के geothermal studies में underground temperature 240 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने का अनुमान लगाया गया है।
इस प्रोजेक्ट के पहले चरण में 1 मेगावाट का पायलट जियोथर्मल पावर प्लांट लगाने की योजना है। प्लांट में टर्बाइन तक पहुंचने वाले fluid का तापमान करीब 200 डिग्री सेल्सियस रखने का लक्ष्य है।
हालांकि, भूतापीय ऊर्जा के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां भी हैं। सबसे पहले, भूतापीय कुओं की खुदाई और बिजली संयंत्र का ढांचा तैयार करने में शुरुआती लागत काफी अधिक होती है। इसके अलावा, भूतापीय ऊर्जा हर जगह उपलब्ध नहीं होती, क्योंकि इसके लिए जमीन के अंदर पर्याप्त गर्मी और गर्म पानी की मौजूदगी जरूरी है। जमीन के अंदर गर्मी और पानी की मात्रा का सही अनुमान लगाने के लिए भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, खोज और लगातार परीक्षण करने पड़ते हैं।
भूतापीय पानी में मौजूद खनिज और रासायनिक पदार्थ पाइप और उपकरणों में जंग तथा खनिजों की परत जमने जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं, जिससे रखरखाव का खर्च बढ़ सकता है। कुछ भूतापीय परियोजनाओं में गर्म पानी या तरल पदार्थ को जमीन से निकालकर वापस जमीन के अंदर भेजने के दौरान छोटे भूकंपीय झटकों का जोखिम भी रहता है।
इसके अलावा, अगर भूतापीय पानी और अन्य तरल पदार्थों का सही तरीके से प्रबंधन न किया जाए, तो भूजल और आसपास के पर्यावरण पर भी असर पड़ सकता है। पुगा वैली जैसे लगभग 14 हजार फीट की ऊंचाई वाले और कठिन पहाड़ी क्षेत्र में खुदाई, भारी मशीनरी पहुंचाना, निर्माण कार्य और नियमित रखरखाव भी चुनौतीपूर्ण है।
इसलिए बड़े स्तर पर बिजली उत्पादन शुरू करने से पहले इस परियोजना की तकनीकी क्षमता, आर्थिक व्यवहार्यता और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत अध्ययन करना जरूरी है।
इस प्रोजेक्ट की खास बात यह है कि geothermal energy सूरज या हवा की तरह मौसम पर निर्भर नहीं रहती और लगातार बिजली उत्पादन में मदद कर सकती है। इससे लद्दाख के दूर-दराज के इलाकों में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति में भी मदद मिल सकती है।
प्रोजेक्ट का आगे का लक्ष्य सिर्फ पायलट प्लांट तक सीमित नहीं है। इसके बाद चुमाथांग क्षेत्र में geothermal surveys और investigations किए जाएंगे। वहां drilling और Detailed Project Report यानी DPR तैयार करके बड़े स्तर पर geothermal energy के commercial इस्तेमाल की संभावनाएं देखी जाएंगी।
भारत में अभी तक बड़े स्तर पर कोई commercial geothermal power plant नहीं है। इसलिए पुगा वैली का यह प्रोजेक्ट भारत में geothermal power generation की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहला कदम माना जा रहा है।
इससे लद्दाख की clean energy, energy security और carbon-neutral Ladakh की दिशा में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
Content Writer: Aarushi
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